रोम – 2000-2015 में वैश्विक विकास के प्रयासों को दिशानिर्देशित करनेवाले सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (एमडीजी) के तहत हुई प्रगति के बाद, दुनिया की सरकारें वर्तमान में 2016-2030 की अवधि के लिए सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) पर बातचीत कर रही हैं। एमडीजी में अत्यधिक गरीबी, भूख, और रोकथाम योग्य रोग समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया गया था, और वे संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक विकास लक्ष्य थे। एसडीजी में चरम गरीबी के खिलाफ लड़ाई को जारी रखा जाएगा, लेकिन इसमें और अधिक समान विकास और पर्यावरण स्थिरता को सुनिश्चित करने की चुनौतियों को, विशेष रूप से मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के खतरों को रोकने के मुख्य लक्ष्य को जोड़ा जाएगा।
लेकिन क्या नए लक्ष्यों के निर्धारण से दुनिया को हमेशा की तरह एक ख़तरनाक सामान्य-रूप-से-व्यवसाय के रास्ते से हटकर वास्तविक सतत विकास के रास्ते पर आने में मदद मिलेगी? क्या संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्य वास्तव में अंतर ला सकते हैं?
एमडीजी से मिला साक्ष्य शक्तिशाली और उत्साहजनक है। सितंबर 2000 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने “सहस्राब्दी घोषणा” को अपनाया था, जिसमें एमडीजी शामिल थे। वे आठ लक्ष्य दुनिया भर के गरीब देशों के लिए विकास के प्रयास के केंद्र बन गए थे। क्या उनसे वास्तव में कोई अंतर पड़ा था? लगता है कि इसका उत्तर हाँ है।
एमडीजी के परिणामस्वरूप, दुनिया के सबसे गरीब देशों में, विशेष रूप से अफ्रीका में, गरीबी को कम करने, रोग नियंत्रण, और स्कूली शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं तक अधिक पहुँच मिलने की दृष्टि से उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वैश्विक लक्ष्यों से वैश्विक प्रयास को सुदृढ़ करने में मदद मिली है।
उन्होंने यह कैसे किया? लक्ष्यों का महत्व क्यों है? लक्ष्य आधारित सफलता के मामले में जॉन एफ. कैनेडी ने 50 साल पहले जो किया था उससे बेहतर अभी तक किसी ने नहीं किया है। अमेरिका के आधुनिक राष्ट्रपतियों द्वारा दिए गए सबसे महान भाषणों में से जून 1963 में दिए गए एक भाषण में, कैनेडी ने कहा था: “अपने लक्ष्य को और अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित करके, इसे और अधिक प्रबंधनीय बनाकर और पहुँच से कम दूर दिखाकर, हम सब लोगों को इसे देखने, इससे उम्मीद करने और इसकी ओर बरबस खिंचे चले जाने में मदद कर सकते हैं।”
लक्ष्यों का निर्धारण करना कई कारणों से महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, वे सामाजिक जुटाव के लिए आवश्यक होते हैं। गरीबी से लड़ने के लिए या सतत विकास हासिल करने में मदद करने के लिए दुनिया को एक दिशा में उन्मुख होने की जरूरत है, लेकिन हमारी कोलाहलपूर्ण, असमान, विभाजित, भीड़भाड़युक्त, दिग्भ्रमित, और अक्सर अभिभूत दुनिया में हमारे साझा उद्देश्यों में से किसी को भी प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करते रहना बहुत कठिन है। वैश्विक लक्ष्यों को अपनाने से दुनिया भर में व्यक्तियों, संगठनों, और सरकारों को दिशा के बारे में सहमत होने के लिए, अनिवार्य रूप से, इस बात पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है कि हमारे भविष्य के लिए वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है।
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लक्ष्यों का एक दूसरा कार्य सहयोगियों पर दबाव बनाना है। एमडीजी को अपनाने से, राजनीतिक नेताओं से सार्वजनिक तौर पर और निजी तौर पर प्रश्न किए गए कि वे अत्यधिक गरीबी को समाप्त करने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं।
तीसरे रूप में लक्ष्यों का महत्व इसलिए होता है कि वे ज्ञान समुदायों - विशेषज्ञता, ज्ञान, और अभ्यास के नेटवर्कों - को सतत विकास की चुनौतियों के संबंध में कार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। जब बड़े लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं, तो ज्ञान और व्यवहार के समुदाय, परिणाम प्राप्त करने के लिए व्यावहारिक रास्तों की सिफारिश करने के लिए एक साथ आगे आते हैं।
अंत में, लक्ष्यों से हितधारकों के नेटवर्क एकजुट हो जाते हैं। समुदाय के नेता, राजनीतिज्ञ, सरकार के मंत्रालय, वैज्ञानिक समुदाय, प्रमुख गैर-सरकारी संगठन, धार्मिक समूह, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, दाता संगठन, और फाउंडेशन सभी एक सामान्य उद्देश्य के लिए एक साथ आने के लिए प्रेरित होते हैं। सतत विकास की जटिल चुनौतियों से निपटने और गरीबी, भूख, और बीमारी के खिलाफ लड़ाई के लिए इस प्रकार की बहु-हितधारक प्रक्रिया का होना आवश्यक है।
जब सोवियत संघ शीत युद्ध के चरम पर था, उस समय कैनेडी ने स्वयं उसके साथ शांति स्थापित करने की अपनी तलाश में आधी सदी पहले लक्ष्य निर्धारित करके नेतृत्व का प्रदर्शन किया। वाशिंगटन, डीसी में अमेरिकी विश्वविद्यालय में दिए गए अपने प्रसिद्ध आरंभिक भाषण के साथ शुरू की गई अपने भाषणों की शृंखला में, कैनेडी ने परमाणु परीक्षणों को समाप्त करने के लिए एक संधि करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए कल्पना और व्यावहारिक कार्रवाई के मिले-जुले आधार पर शांति के लिए एक अभियान तैयार किया।
शांति के इस भाषण के सिर्फ सात हफ्तों बाद, अमेरिका और सोवियत संघ ने शीत युद्ध की हथियारों की दौड़ को धीमा करने के लिए सीमित परीक्षण प्रतिबंध संधि (एलटीबीटी) पर हस्ताक्षर किए,जो एक ऐसा ऐतिहासिक समझौता था जिसके बारे में केवल कुछ महीने पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हालाँकि, एलटीबीटी से निश्चित रूप से शीत युद्ध तो खत्म नहीं हुआ, पर इसने यह सिद्ध कर दिया कि बातचीत और समझौता संभव है, और इसने भविष्य के समझौतों के लिए नींव रखी।
लेकिन किसी लक्ष्य या किन्हीं लक्ष्यों को निर्धारित कर लेने के बाद भारी मात्रा में परिणाम प्राप्त करने के बारे में कुछ भी अपरिहार्य नहीं होता है। लक्ष्यों को तय करना महज कार्रवाई की किसी योजना को लागू करने का पहला कदम होता है। लक्ष्य निर्धारित कर लेने के बाद अच्छी नीति तैयार करने, पर्याप्त वित्तपोषण, और कार्य-निष्पादन पर निगरानी के लिए नई संस्थाएँ तैयार करने का कार्य भी होना चाहिए। और, जैसे-जैसे परिणाम मिलते जाएँ, उनका आकलन किया जाना चाहिए, और रणनीतियों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए और उन्हें सतत रूप से नीति संबंधी प्रतिक्रिया में अपनाया जाना चाहिए, और यह सब स्पष्ट लक्ष्यों और समय-सीमाओं के दबावों और अभिप्रेरणाओं के अंतर्गत किया जाना चाहिए।
दुनिया ने जिस तरह एमडीजी के मामले में भारी प्रगति की है, उसी तरह हम एसडीजी को प्राप्त करने के लिए अपना रास्ता खोज सकते हैं। गरीबी, असमानता, और पर्यावरण क्षरण से लड़ने के प्रयासों के चहुँ ओर सनक, भ्रम, और अवरोधकारी राजनीति व्याप्त होने के बावजूद, सफलता मिलना संभव है। हो सकता है कि विश्व की प्रमुख शक्तियों का रुख उपेक्षापूर्ण दिखाई दे, लेकिन यह बदल सकता है। विचारों का महत्व होता है। वे सार्वजनिक नीति को इतनी अधिक गहराई से और तेजी से प्रभावित कर सकते हैं कि विरोधी उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।
सितंबर 1963 में संयुक्त राष्ट्र में दिए गए अपने अंतिम भाषण में कैनेडी ने शांति स्थापित करने के समकालीन प्रयासों का वर्णन करते हुए आर्किमिडीज़ का हवाला दिया, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने "लीवर के सिद्धांतों को समझाने के संदर्भ में, अपने दोस्तों के सामने यह घोषित किया था कि: 'मुझे कोई ऐसी जगह दो जहाँ मैं खड़ा हो सकूँ - और मैं दुनिया को हिलाकर रख दूँगा।" पचास साल बाद, दुनिया को सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए अब हमारी पीढ़ी की बारी है।
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Donald Trump’s attempt to reindustrialize the US economy by eliminating trade deficits will undoubtedly cause pain and disruption on a massive scale. But it is important to remember that both major US political parties have abandoned free trade in pursuit of similar goals.
argues that America’s protectionist policies reflect a global economic reordering that was already underway.
Donald Trump and Elon Musk's reign of disruption is crippling research universities’ ability to serve as productive partners in innovation, thus threatening the very system that they purport to celebrate. The Chinese, who are increasingly becoming frontier innovators in their own right, will be forever grateful.
warns that the pillars of US dynamism and competitiveness are being systematically toppled.
रोम – 2000-2015 में वैश्विक विकास के प्रयासों को दिशानिर्देशित करनेवाले सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (एमडीजी) के तहत हुई प्रगति के बाद, दुनिया की सरकारें वर्तमान में 2016-2030 की अवधि के लिए सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) पर बातचीत कर रही हैं। एमडीजी में अत्यधिक गरीबी, भूख, और रोकथाम योग्य रोग समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया गया था, और वे संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक विकास लक्ष्य थे। एसडीजी में चरम गरीबी के खिलाफ लड़ाई को जारी रखा जाएगा, लेकिन इसमें और अधिक समान विकास और पर्यावरण स्थिरता को सुनिश्चित करने की चुनौतियों को, विशेष रूप से मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के खतरों को रोकने के मुख्य लक्ष्य को जोड़ा जाएगा।
लेकिन क्या नए लक्ष्यों के निर्धारण से दुनिया को हमेशा की तरह एक ख़तरनाक सामान्य-रूप-से-व्यवसाय के रास्ते से हटकर वास्तविक सतत विकास के रास्ते पर आने में मदद मिलेगी? क्या संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्य वास्तव में अंतर ला सकते हैं?
एमडीजी से मिला साक्ष्य शक्तिशाली और उत्साहजनक है। सितंबर 2000 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने “सहस्राब्दी घोषणा” को अपनाया था, जिसमें एमडीजी शामिल थे। वे आठ लक्ष्य दुनिया भर के गरीब देशों के लिए विकास के प्रयास के केंद्र बन गए थे। क्या उनसे वास्तव में कोई अंतर पड़ा था? लगता है कि इसका उत्तर हाँ है।
एमडीजी के परिणामस्वरूप, दुनिया के सबसे गरीब देशों में, विशेष रूप से अफ्रीका में, गरीबी को कम करने, रोग नियंत्रण, और स्कूली शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं तक अधिक पहुँच मिलने की दृष्टि से उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वैश्विक लक्ष्यों से वैश्विक प्रयास को सुदृढ़ करने में मदद मिली है।
उन्होंने यह कैसे किया? लक्ष्यों का महत्व क्यों है? लक्ष्य आधारित सफलता के मामले में जॉन एफ. कैनेडी ने 50 साल पहले जो किया था उससे बेहतर अभी तक किसी ने नहीं किया है। अमेरिका के आधुनिक राष्ट्रपतियों द्वारा दिए गए सबसे महान भाषणों में से जून 1963 में दिए गए एक भाषण में, कैनेडी ने कहा था: “अपने लक्ष्य को और अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित करके, इसे और अधिक प्रबंधनीय बनाकर और पहुँच से कम दूर दिखाकर, हम सब लोगों को इसे देखने, इससे उम्मीद करने और इसकी ओर बरबस खिंचे चले जाने में मदद कर सकते हैं।”
लक्ष्यों का निर्धारण करना कई कारणों से महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, वे सामाजिक जुटाव के लिए आवश्यक होते हैं। गरीबी से लड़ने के लिए या सतत विकास हासिल करने में मदद करने के लिए दुनिया को एक दिशा में उन्मुख होने की जरूरत है, लेकिन हमारी कोलाहलपूर्ण, असमान, विभाजित, भीड़भाड़युक्त, दिग्भ्रमित, और अक्सर अभिभूत दुनिया में हमारे साझा उद्देश्यों में से किसी को भी प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करते रहना बहुत कठिन है। वैश्विक लक्ष्यों को अपनाने से दुनिया भर में व्यक्तियों, संगठनों, और सरकारों को दिशा के बारे में सहमत होने के लिए, अनिवार्य रूप से, इस बात पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है कि हमारे भविष्य के लिए वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है।
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लक्ष्यों का एक दूसरा कार्य सहयोगियों पर दबाव बनाना है। एमडीजी को अपनाने से, राजनीतिक नेताओं से सार्वजनिक तौर पर और निजी तौर पर प्रश्न किए गए कि वे अत्यधिक गरीबी को समाप्त करने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं।
तीसरे रूप में लक्ष्यों का महत्व इसलिए होता है कि वे ज्ञान समुदायों - विशेषज्ञता, ज्ञान, और अभ्यास के नेटवर्कों - को सतत विकास की चुनौतियों के संबंध में कार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। जब बड़े लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं, तो ज्ञान और व्यवहार के समुदाय, परिणाम प्राप्त करने के लिए व्यावहारिक रास्तों की सिफारिश करने के लिए एक साथ आगे आते हैं।
अंत में, लक्ष्यों से हितधारकों के नेटवर्क एकजुट हो जाते हैं। समुदाय के नेता, राजनीतिज्ञ, सरकार के मंत्रालय, वैज्ञानिक समुदाय, प्रमुख गैर-सरकारी संगठन, धार्मिक समूह, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, दाता संगठन, और फाउंडेशन सभी एक सामान्य उद्देश्य के लिए एक साथ आने के लिए प्रेरित होते हैं। सतत विकास की जटिल चुनौतियों से निपटने और गरीबी, भूख, और बीमारी के खिलाफ लड़ाई के लिए इस प्रकार की बहु-हितधारक प्रक्रिया का होना आवश्यक है।
जब सोवियत संघ शीत युद्ध के चरम पर था, उस समय कैनेडी ने स्वयं उसके साथ शांति स्थापित करने की अपनी तलाश में आधी सदी पहले लक्ष्य निर्धारित करके नेतृत्व का प्रदर्शन किया। वाशिंगटन, डीसी में अमेरिकी विश्वविद्यालय में दिए गए अपने प्रसिद्ध आरंभिक भाषण के साथ शुरू की गई अपने भाषणों की शृंखला में, कैनेडी ने परमाणु परीक्षणों को समाप्त करने के लिए एक संधि करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए कल्पना और व्यावहारिक कार्रवाई के मिले-जुले आधार पर शांति के लिए एक अभियान तैयार किया।
शांति के इस भाषण के सिर्फ सात हफ्तों बाद, अमेरिका और सोवियत संघ ने शीत युद्ध की हथियारों की दौड़ को धीमा करने के लिए सीमित परीक्षण प्रतिबंध संधि (एलटीबीटी) पर हस्ताक्षर किए,जो एक ऐसा ऐतिहासिक समझौता था जिसके बारे में केवल कुछ महीने पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हालाँकि, एलटीबीटी से निश्चित रूप से शीत युद्ध तो खत्म नहीं हुआ, पर इसने यह सिद्ध कर दिया कि बातचीत और समझौता संभव है, और इसने भविष्य के समझौतों के लिए नींव रखी।
लेकिन किसी लक्ष्य या किन्हीं लक्ष्यों को निर्धारित कर लेने के बाद भारी मात्रा में परिणाम प्राप्त करने के बारे में कुछ भी अपरिहार्य नहीं होता है। लक्ष्यों को तय करना महज कार्रवाई की किसी योजना को लागू करने का पहला कदम होता है। लक्ष्य निर्धारित कर लेने के बाद अच्छी नीति तैयार करने, पर्याप्त वित्तपोषण, और कार्य-निष्पादन पर निगरानी के लिए नई संस्थाएँ तैयार करने का कार्य भी होना चाहिए। और, जैसे-जैसे परिणाम मिलते जाएँ, उनका आकलन किया जाना चाहिए, और रणनीतियों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए और उन्हें सतत रूप से नीति संबंधी प्रतिक्रिया में अपनाया जाना चाहिए, और यह सब स्पष्ट लक्ष्यों और समय-सीमाओं के दबावों और अभिप्रेरणाओं के अंतर्गत किया जाना चाहिए।
दुनिया ने जिस तरह एमडीजी के मामले में भारी प्रगति की है, उसी तरह हम एसडीजी को प्राप्त करने के लिए अपना रास्ता खोज सकते हैं। गरीबी, असमानता, और पर्यावरण क्षरण से लड़ने के प्रयासों के चहुँ ओर सनक, भ्रम, और अवरोधकारी राजनीति व्याप्त होने के बावजूद, सफलता मिलना संभव है। हो सकता है कि विश्व की प्रमुख शक्तियों का रुख उपेक्षापूर्ण दिखाई दे, लेकिन यह बदल सकता है। विचारों का महत्व होता है। वे सार्वजनिक नीति को इतनी अधिक गहराई से और तेजी से प्रभावित कर सकते हैं कि विरोधी उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।
सितंबर 1963 में संयुक्त राष्ट्र में दिए गए अपने अंतिम भाषण में कैनेडी ने शांति स्थापित करने के समकालीन प्रयासों का वर्णन करते हुए आर्किमिडीज़ का हवाला दिया, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने "लीवर के सिद्धांतों को समझाने के संदर्भ में, अपने दोस्तों के सामने यह घोषित किया था कि: 'मुझे कोई ऐसी जगह दो जहाँ मैं खड़ा हो सकूँ - और मैं दुनिया को हिलाकर रख दूँगा।" पचास साल बाद, दुनिया को सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए अब हमारी पीढ़ी की बारी है।